by pranjalduttrai | Dec 2, 2018 | श्रृंगार रस कविता, साहित्य
पलकों में आकाश लिए मैं, सागर तट को कबतक देखुं फिर वहीं कजरारी आँखें…बोलो कबतक उन्हें निरखूँ । हर शाम तु ही अंतिम सरगम,हर सुबह की तु पहली लोरी, दिनरात तेरी इन यादों में, बहते कुछ आँसू चोरी-चोरी कभी शाम जो निपट अकेले,इन अधरो को छुना चाहुं, वहीं सांझ की चंचल...
by pranjalduttrai | Dec 1, 2018 | श्रृंगार रस कविता, साहित्य
एक ललक तुमसे मिलने का, सपना बनकर बीत गया,दिल धडका मन रोया फिर भी ,’जिद्द’ आखिर ही जीत गया”। कुछ दोष तुम्हारी यादों का, कुछ खोट हृदय में मेरे थी,कुछ पलकें अल्हड़ भारी सी,कुछ व्याकुल नयनोँ की देरी थी,तबसे कुछ आंसू आंखों में, बस कैदी बनकर रहते थेहरबार...
by pranjalduttrai | Nov 30, 2018 | श्रृंगार रस कविता, साहित्य
है प्रेम बड़ा उलझा सौदाउम्रें लेता एक पल देकर,बस यादों का अवलंबन हैअब तड़प रहे तुमसे दुर होकर, उन वादों का कोई शोक नहींहां,पर दुआ का तेरे आभारी हूँ,तु मुड़ी तो राह मुड़ गई परमैं पथिक प्रेमी अभिसारी हूँ। है चोट लगी दिल पर इतनी किसच भी अब झुठी लगती हैहै स्वप्न टूटे दिल...