प्याज की कीमतें एक बार फिर आसमान छूने को हैं, पिछले डेढ़ महीनों में इसकी कीमतें दो गुनी हो गई हैं। कीमतों में वृद्धि अब एक सालाना प्रक्रिया बन गया है। पिछले साल अगस्त से नवंबर, इन चार महीनों के दौरान प्याज कि कीमतों में 10 गुना तक की वृद्धि देखने को मिली और इस दौरान 180 रुपए तक की कीमत लोगो को एक किलो प्याज़ के लिए चुकानी पड़ी। इस साल भी कीमतों में काफी वृद्धि हुई है, और एक बार फिर यह जेब पर भारी पड़ने वाला है। हमने पिछ्ले साल भी इस विषय पर प्रमुखता से खबरे लिखीं जिन्हें स्थानीय अखबारों में जगह भी मिला लेकिन, फिर भी कीमतों में वृद्धि का यह चलन (ट्रेंड) इस बार भी दिख रहा है। सरकारें क्या इसपर क्या कर रही है किसी को कुछ पता नहीं। Financial express, Indian Express or the economics times में छपे खबरों के मुताबिक इस साल भी कीमतों में वृद्धि होनी थी,लेकिन शायद बिहार में होने वाले विधान सभा चुनावों के कारण अब तक रुकी हुई है। पिछले हप्ते यह खबर भी आई कि प्याज, की कीमतें 65 से 70 रुपए किलो तक बढ सकती हैं। फिर कुछ ही मिनटों बाद वेबसाइट से यह खबर हटा लिया गया। सरकार इस साल प्याज के निर्यात पर रोक लगा कर कीमतों को नियंत्रित करने का कोशिश कर रही है जो कुल उत्पादन का 11 फीसदी है। कोराना महामारी के चलते 6 महीने से देशव्यापी बंदी ने ऐसे ही लोगो को बहुत आर्थिक कष्ट दे चुका है, फिर प्याज़ की कीमतों में वृद्धि भी एक समस्या बन कर लोगो के सामने खड़ा है। इसे भी पढ़े…………… ” जेब पर एक बार फिर मार, प्याज 60 के पार” आदित्य मिश्रा, (सितंबर 22,2019) प्याज भारतीय भोजन का एक महत्वपर्ण हिस्सा है। भारत में प्याज का उत्पादन और उपभोग दोनों भारी मात्रा में होता है। सामान्यतया बाजारों में प्याज ₹20 प्रति किलो से कम रहता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों से कीमतों में अचानक वृद्धि होता रहा है। कभी-कभी कीमतें इतनी बढ़ जाती हैं कि प्याज थालियों से गायब ही हो जाता है। पिछले 1 महीने से प्याज की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है और अभी प्याज की कीमत 60 के पार हो गई है। कहीं-कहीं प्याज ₹80 प्रति किलो तक बिक रहा है। अचानक कीमतों में वृद्धि लोगों को काफी हैरान कर रहा है। साल 2012 से 2018 के बीच प्याज का उत्पादन 20000 टन रहा। प्याज का उत्पादन सबसे अधिक उत्पादक महाराष्ट्र में होता है, जो कुल उत्पादन का 30 फीसदी है। मध्य प्रदेश, बिहार, गुजरात, बड़े मात्रा में प्याज उत्पादित करते हैं। देश के अन्य राज्य भी अपने हिस्से का प्याज उत्पादित कर लेते है जो साल भर के उपभोग के लिए काफी है। सरकार द्वारा प्याज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) ₹8 से ₹12 प्रति किलो तक निर्धारित किया गया है। बावजूद इसके किसानों को ₹3 से ₹5 प्रति किलो घाटे में बेचना पड़ता है। बीबीसी के दिसंबर 2018 और अप्रैल 2019 के रिपोर्ट के अनुसार किसानों को डेढ़ रुपए प्रति किलो तक बेचने पड़ते हैं जो उनकी लागत से काफी कम है। उदहारण के तौर पर, बीबीसी के ही एक रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में एक किसान को 1500 किलो प्याज बेचने पर मात्र 1.53 रुपए बचे। यही हाल अन्य ताज़ी सब्जियों का भी है, बाजार में कोई भी सब्जी 40 रुपए प्रति किलो से कम नहीं है। प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी सोचने पर मजबूर करती है कि इतनी भारी मात्रा में उत्पादन होने के बावजूद कीमतें कम क्यों नहीं है। सरकारें भी इसपर विशेष ध्यान नहीं दे रही है। कालाबाजारी, बफर भंडारण पर भी सरकार का मजबूत नियंत्रण नहीं है। यदि ऐसा होता तो कीमतें इस हद तक नहीं बढ़ती। दैनिक वस्तुओं की कीमत वृद्धि पर भी सरकार का नियंत्रण कमजोर है। आर्थिक मंदी के संभावित संकट के बीच कीमतों में शुरुआती वृद्धि लोगों की चिंता बढ़ा रहा है। पर सरकार प्राथमिकता कौन तय करे। आदित्य मिश्रा अर्थशास्त्र स्नातक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी[/et_pb_text][/et_pb_column][/et_pb_row][/et_pb_section]
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