Donald trump अब अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति के रूप में जाने जाएंगे। जिस नेता के नाम के पहले भूतपूर्व लगता है उस नाम के साथ कई महत्वपूर्ण यादें भी लोगों के मन से जुड़ी हुई होती हैं। उनमें कुछ अच्छी होती है, तो कुछ बुरी। ट्रंप के साथ भी यह अपवाद नहीं रहा और उनके साथ भी दोनों तरह की यादें, उनके 4 साल के कार्यकाल के दौरान जुड़ चुकी हैं। Trump 21 जनवरी को बड़े भारी मन से व्हाइट हाउस छोड़कर गए होंगे। तो क्या अमेरिकियों का मन भी ट्रंप के जाने से भारी या दुखी हुआ होगा? ऐसा बिल्कुल संभव है, लेकिन चुनाव परिणामों में “अमेरिका फर्स्ट” की नीति पर चलने वाले ट्रंप को लोगों ने “वाइडन फर्स्ट” की नीति पर चलते हुए सत्ता से बेदखल कर दिया। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति होने के नाते ट्रंप लगातार एक अभिभावक की भूमिका में रहने का प्रयास किया। लेकिन कई बार अपने बड़बोलेपन के कारण आलोचना भी झेलनी पड़ी। पूर्व राष्ट्रपति, लगातार अपने देश के मीडिया के निशाने पर रहे। पत्रकारों से उलझना, उनको डांटना, खुलेआम धमकी देना, पत्रकारों का उनके द्वारा दिए गए बयानों में झूठ की संख्या का गिनती कर अलग से रिपोर्ट बनाकर पेश करना, ऐसी कई चीजें है जो चर्चा में रहीं है। 2016 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी उन पर कई गंभीर आरोप लगाए गए है, लेकिन पेशे से उद्योगपति ट्रंप, आरोपों पर सफाई देते आगे निकल गए। उत्तर कोरिया के सनकी तानाशाह किम जोंग उन को ट्रंप ने सिंगापुर में मीटिंग के बाद शांत कराया।हालांकि उस मामले में रूस की भी एक बड़ी भूमिका रही थी। प्रधानमंत्री मोदी के अच्छे मित्रों में एक ट्रंप रक्षा और राजनयिक जैसे कई मामलों में भारत के साथ हमेशा खड़े रहे। हाल ही में चीन के साथ हुए विवाद में ट्रंप ने कभी भारत के पक्ष में तो कभी चीन के खिलाफ और कभी बहुत सधे हुए बयान दिया। 5जी विकसित करने वाली चीन की कंपनी हुवाई को ट्रंप ने कई देशों में प्रतिबंधित कर दिया। Corona महामारी के मामले में भी ट्रंप के बयान लगातार चीन के खिलाफ थे। उन्होंने कोरोना को चाइनीस वायरस का भी नाम दिया था। कुल मिलाकर यदि उनके 4 साल के कार्यकाल को देखें तो ट्रंप, चीन के खिलाफ ओबामा की तुलना में अधिक सख्त और स्पष्ट थे। 2016 में अपने कार्यकाल की शुरुआत के 1 वर्ष में ही ट्रंप ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ एक बड़ा बयान अपने ट्विटर के माध्यम से दिया था, उन्होंने कहा था कि अमेरिका द्वारा मिलने वाली सहायता राशि को पाकिस्तान आतंकवाद के लिए इस्तेमाल करता है। 1 जनवरी 2018 के स्वीट में ट्रंप ने लिखा कि 2003 से 2018 तक अमेरिका ने 3 बिलियन डॉलर की सहायता राशि पाकिस्तान को दी है। बराक ओबामा ने अपने कार्यकाल के दौरान जहां 2.1 की सहायता राशि पाकिस्तान को दी ट्रंप ने अपने कार्यकाल के दौरान इस में लगातार कमी करते हुए $562 तक की ही मदद पाकिस्तान को पहुंचाई। (©बीबीसी हिंदी) पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से सबसे अधिक त्रस्त भारत, आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए विश्व को एकजुट करने में लगा रहता है। इसलिए ट्रंप का यह बयान भारत के इस लड़ाई में अमेरिका का एक मजबूत सात के रूप में था। इन सब के बावजूद भारत के परिपेक्ष में ट्रंप के कार्य को देखें तो हम पाएंगे कि व्यापार के क्षेत्र में ट्रंप भारत के लिए बहुत शुभ साबित नहीं हुए। ट्रंप का ईरान के साथ विवाद से चाबाहार के विकास में बाधा और भारत में तेल की कीमतें प्रभावित हुईं, H1 विजा विवाद, जीएसपी यानी “जनरलाइज सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस” लिस्ट जो अमेरिका की व्यापारिक वरीयता लिस्ट है, जिसके तहत अमेरिका ने 5 जून 2019 को व्यापार में सामान्य तरजीही व्यवस्था जैसी चीजों पर भारत को मुक्त आयात की सुविधा देनी बंद कर दी थी। इससे भारत को लगभग साढ़े 5 अरब डॉलर का निर्यात प्रभावित हुआ और लगभग 3600 करोड़ का सालान मिलने वाला फायदा बंद हो गया। ट्रंप ने अमेरिका के लिए क्या बेहतर किया और उनके कौन से काम अमेरिका के हित में नहीं थे, यह बड़े चर्चा का विषय है। लेकिन, इतना अवश्य है कि ट्रंप की सोच हमेशा अमेरिका के हित में ही रहा है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में ट्रंप लगातार कार्यरत रहे। महंगाई दर को 1.7% से कम कर 1.5% पर लाए। गरीबी रेखा से नीचे लगभग 34 मिलियन लोगों को उन्होंने गरीबी से बाहर निकाला जो प्रतिशत में 10.5 है। रोजगार का दर भी अमेरिका में 57.4% है। बेरोजगारी का 6.9% जिसे ट्रंप ने कम किया। आयात और निर्यात में लॉकडाउन के कारण जरूर कुछ कमी आई है। लेकिन, Corona के पहले का रिकॉर्ड इस मामले में सही है। ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका सालाना 3.42 ट्रिलियन डॉलर आय अर्जित करता जबकि 6.55 ट्रिलियन डॉलर अमेरिका का वार्षिक खर्च रहा। ट्रंप बोलने का मामलों में एक मुखर राजनेता थे उनके बयानों से किसे क्या फर्क पड़ता है, कितना फर्क पड़ता है इसका आकलन किए बिना वह कुछ भी बोलने की हिम्मत रखते थे। ट्रंप का शासन से जाना इस बात का बिल्कुल प्रमाण नहीं है की ट्रंप अमेरिका के एक मजबूत राष्ट्रपति नहीं थे। उन्होंने राष्ट्रपति के पद – परंपरा और गरिमा को हमेशा बनाए रखा। ट्रंप के शासन काल में अमेरिका में हर वो घटनाएं हुई जो किसी भी देश में आम बात है। लेकिन उनकी मीडिया ने कभी भी उन्हें मौत का सौदागर, सामूहिक हत्यारा, चोर, धोखेबाज आदि विशेषणों में नहीं बांधा। ट्रंप ने ओबामा की तरह स्वयं को नोबल पुरस्कार नहीं दिया। हालांकि चुनाव के आखिरी दिनों में और विशेष रूप से परिणाम आने के बाद कुछ बौखलाहट उनमें जरूर देखने को मिली बावजूद इसके ट्रंप अमेरिका के लिए बेहतरीन और सच्चा किरदार थे। आदित्य मिश्रा अर्थशास्त्र स्नातक एडवांस डिप्लोमा, हिंदी पत्रकारिता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस अर्थशास्त्र परस्नातक, IGNOU
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