
5 अगस्त 2020 का दिन हिंदुस्तान के लिए ऐतिहासिक होने जा रही है जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का भूमि पूजन होने जा रहा है। वर्षों से विवादित बाबरी मस्जिद विध्वंस एवं राम मंदिर निर्माण की एक लंबी लड़ाई , कोर्ट से लेकर सड़क पर चलती अाई थी। जिसमे सुप्रीम कोर्ट के बहुप्रतीक्षित फैसले के आने और राम मंदिर निर्माण कार्य को प्रशस्त होने के बाद इस लड़ाई का अन्त हो गया और विवाद से जुड़े सभी पक्षों ने उसको शांतिपूर्ण रूप से स्वीकार भी किया।
यहां तक पहुंचने के लिए कई घटनाएं घटित हुई एवं महत्वपूर्ण रहीं जिनको जानना अति आवश्यक है। आइए डालते हैं उनमें से कुछ प्रमुख घटनाओं पर एक नजर…
रामजन्मभूमि के लिये दशकों से अब तक तक़रीबन 80 लड़ाईयां हो चुकी हैं।तीन लाख से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं। कई सरकारें बन और बिगड़ चुकी है। राम मंदिर निर्माण आंदोलन ने देश की राजनीति को ही बदल के रख दिया। इस आंदोलन से निकली पार्टी बीजेपी आज केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और देश के कई राज्यों में अपनी सरकार चला रही है।

आंदोलन की प्रस्ताव ____
साल 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में बीजेपी का अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता लालकृष्ण आडवाणी कर रहे थे। आडवाणी और बाजपई की जोड़ी देश के राजनीति कि सबसे हिट जोड़ी मानी जाती थी। इसी अधिवेशन में राम मंदिर निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया और तब से ये बीजेपी की घोषणापत्र का अंग बन गया।
लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा__
इसी के बाद से 25 सितंबर 1990 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या तक अपनी रथ यात्रा शुरू की थी। इस यात्रा में लाखों कार सेवक उनके साथ अयोध्या के लिए रवाना हुए थे।इस रथयात्रा ने देश को राम नाम में बांध दिया।श्रीराम को लेकर लोग किस कदर भावनाओं के सरयू में डुबकी लगा रहे थे वो इस बात से समझें कि जिस रास्ते से रथ गुजरता लोग वहाँ की मिट्टी सिर पर लगा लेते।
रथ यात्रा को 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन लालू यादव की सरकार ने रोका था और तब आडवाणी को हिरासत में भी लिया गया था। उनके अलावा विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल को भी हिरासत में लिया गया था लेकिन वह पुलिस कस्टडी से छूटकर निकल गए थे। बिहार में लाल कृष्ण आडवाणी को रोके जाने के बावजूद लाखों की संख्या में कार सेवक अयोध्या के लिए कूच कर चुके थे। तब यूपी में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी जिसने कार सेवकों की गिरफ्तारी के आदेश जारी कर दिए थे।
हालांकि जुलाई 1991 के यूपी चुनाव में बीजेपी को बड़ी बढ़त हासिल हुई और कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री चुने गए थे। वहीं राजीव गांधी की हत्या के बाद केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी और नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री बने।
6 दिसंबर को बाबरी विध्वंस

6 दिसंबर,1992 को कारसेवकों ने विवादित ढाँचा ढहा दिया।इस वजह से कल्याण सिंह ने पद से इस्तीफा दे दिया।7 दिसंबर 1992 को केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ने UP सरकार को बर्खास्त कर दिया।
इसके बाद राजस्थान, मध्यप्रदेश ,हिमाचल प्रदेश की बीजेपी सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया।
विध्वंस के बाद दरअसल केंद्र ने आरएसएस,विश्व हिंदू परिषद,बजरंग दल पर पाबंदी लगा दी थी। बीजेपी सरकारों को इस आधार पर बर्खास्त किया गया कि इनके संबंध प्रतिबंधित संगठनों से हैं। बैलेंस करने के लिये राव ने ज़मायते इस्लामी और इस्लामी सेवक संघ पर भी बैन लगा दिया था। तब कल्याण सिंह ने अपने एक बयान में कहा था कि उनकी सरकार का मकसद अब पूरा हो गया और राम मंदिर के लिए सरकार की कुर्बानी कोई बड़ी बात नहीं है।
नब्बे के दशक में अयोध्या आंदोलन के असली रणनीतिकार आरएसएस के मोरोपंत_पिंगले थे।
उनकी बनाई योजना के तहत देशभर में करीब तीन लाख रामशिलाएँ पूजी गई।लगभग 25 हजार शिला यात्राएँ अयोध्या के लिए निकली थीं।40 देशों से पूजित शिलाएँ अयोध्या आई थीं।
1992 की कारसेवा के कारण प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने बीजेपी के ख़िलाफ़ एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया था।
लेकिन महत्वपूर्ण ये भी है कि उस कारसेवा में PM के बेटे प्रभाकर राव का घरेलू नौकर जो राम भक्त था,वो भी आया था। अयोध्या में मलबे में दबकर मारा गया।
कलकत्ता के दो भाई-राजकुमार कोठारी(23) शरद कोठारी(20) जिसने 30 अक्टूबर की कारसेवा में 1990 को विवादित इमारत के गुंबद पर भगवा फहराया था,
उन्हें एक घर से निकालकर सुरक्षा बलों ने गोली मार दी।अपने मां-बाप के यही दो बेटे थे।सरयू किनारे इनका अंतिम संस्कार हुआ था।
यह कहानी हमारे लिए ‘प्रभात पांडेय (बी.एच.यू)‘ जी ने की है।
