आप बिहार से हैं या संबंध रखते हैं, तो आजकल एक सवाल आपसे जरूर पूछा जाता होगा, कि बिहार में बाढ़ की क्या स्थिति है? और आप वहीं घिसा – पिटा जवाब देकर किसी और बात में लग जाते हैं।

लेकिन कब तक?

कब तक इन सवालों के जवाब को यूं ही टालते रहेंगे, कब तक आप समझ पाएंगे की हमारा ये जवाब अब बदलना चाहिए, कब तक हम ये बोलने कि स्थिति में होंगे की इस साल बाढ़ तो आई है, लेकिन कोई दिक्कत नहीं है।


मानसून का आना हर किसी के लिए एक आनंददायक खबर होता है। लेकिन बिहार के लिए यह एक शोक समाचार से कम नहीं होता। बिहार की भौगोलिक स्थिति ऐसी ही है कि बाढ़ का आना एक अनिवार्य सत्य है. उत्तर में हिमालय से निकलने वाली कई नदियां तथा जलधाराएं बिहार से ही होकर प्रवाहित होती है, जो बरसात के दिनों में जलस्तर बढ़ने पर विध्वंसक बाढ़ का रूप ले लेती हैं, जिसे बिहार को हर साल झेलना ही पड़ता है। लेकिन इस दौरान हुई तबाही और इसके बाद की स्थिति को समझने के लिए सबसे पहले हम कुछ आंकड़ों पर नजर डालते है।

BIHAR 2015 : PERFORMANCE OF POLITICAL PARTIES

बिहार 94163 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के साथ क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का 13 वां राज्य है। यहां देश कि लगभग 16% आबादी रहती है। कृषि और असंगठित क्षेत्र रोजगार के प्रमुख स्रोत है।यूपीएससी, आईआईटी, जैसे देश के अन्य बड़े प्रतियोगी परीक्षाओं में बिहार के छात्र हर साल सबसे अव्वल रहते है।लेकिन, इसके बावजूद बिहार हमेशा से सरकारों के प्रमुख प्राथमिकताओं में नहीं रहता है। बिहार में बाढ़ के, पिछले 5 वर्षों के औसत आंकड़ों को देखे तो, इससे हर साल लगभग पूरा उत्तर बिहार प्रभावित होता है। 1.5 से 2 करोड़ लोग हर साल इसके जद में आते है। 8 से 10 लाख लोगों के घर या तो बह जाते हैं या फिर से रहने लायक नहीं रह जाते। 9-10 लाख एकड़ के फसल खेतो में ही नस्ट हो जाते है। प्रभावित लोगों के मवेसी, घरों में रखे अनाज आदि नष्ट हो जाते है। सड़क, हाईवे, पूल – पुलिया, रेलवे व अन्य सरकारी संसाधनों को करोड़ों के नुकसान होते है। हालांकि राज्य सरकार मरने वालों और लापता लोगो के आंकड़ों को हमेशा छुपाती है।


राहत और बचाव कार्य के लिए हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जाते है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार सैकड़ों करोड़ राहत राशि की घोषणा करती है। लेकिन ये पैसे कहां जाते है, किसी को नहीं पता।

हाल ही में कोरोना महामारी के शुरुआती दिनों में ही इससे बचाव के लिए “मुख्यमंत्री राहत कोष में”  प्रत्येक विधायक (एमएलए और एमएलसी) को अपने फंड से 50 लाख देने का आदेश दिया गया था। यदि सभी विधायक इस रकम को मुख्यमंत्री राहत कोश में जमा किए होने तो यह लगभग 1750 करोड़ होता है, लेकिन यह पैसा कहा गया किसी कोई नहीं जानता। हालांकि इस आदेश के कुछ ही दिनों बाद ही सूत्रों से ये खबर मिली कि यह एक घोटाला था और इसकी इसकी इंटरनल इंक्वायरी चल रही है। इसके बाद इस बात की कोई खबर नहीं है।

यह अचानक आए एक आपदा में किया गया कथित घोटाला है।आप सोचिए कि हर साल निश्चित आने वाले बाढ़ में कितने का हेरा – फेरी  होता है,आप अंदाजा लगा सकते है।साल 2017 में मवेशियों को गवां चुके लोगो को मुआवजा देने की घोषणा की गई लेकिन कितनी को मिला, कौन बंचित रहा इसका सरकारी आंकड़ा भी नहीं है।पिछले साल बढ़ ने राजधानी पटना में क्या तांडव मचाया यह सबने देखा। मुख्य मंत्री, मंत्री, विधायक और अन्य जाने माने लोगो को एनडीआरएफ की टीम ने बचाया।


कुल मिला के हम कह सकते है कि बिहार का यह बाढ़ नेताओं और दलालों के लिए एक अवसर होता है, जब करोड़ों के रुपए घोटाला के अपने जेबों में भरने का मौका मिलता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात, बिहार के लोगों का इसपर ध्यान न देना है। हम करोड़ों पीड़ित लोगों के दुख टीवी, अखबारों, और सोशल मीडिया के माध्यम से हर साल देखते है, चर्चा करते हैं, दुखी होते है और फिर भूल जाते है।बिहार का यह बाढ़ कभी भी किसी भी चुनाव का अहम मुद्दा नहीं रहा है जबकि इससे सुबा के 70 से अधिक प्रतिशत लोग सीधे प्रभावित होते है।

दिल्ली 2020 चुनावी रिजल्ट अध्ययन

इस साल या अगले साल विधानसभा चुनाव होने है, यह बिहारियों के लिए मौका है जब वे सरकार से एक व्यापारी कि भांति मोल – भाव कर सकते है।जिस पार्टी और प्रतिनिधि की तरफ से सबसे विश्वनीय और निश्चित आश्वासन मिले उसे ही वोट करे, इसके बाद ही उम्मीद की जा सकती है कि हम विध्वंसक बाढ़ के ख़तम होने के बाद जल्दी से पुनर्वास कि स्थिति में होंगे।भ्रष्टाचार को लेकर हम बिना किसी आधार के मुख्य मंत्री पर आरोप तो नहीं लगा सकते लेकिन आप देखेंगे कभी ना कभी समय का सुई उनके तरफ भी घूमेगा और न्याय मिलेगा।

लेखक, लेख में दिए गए किसी भी आंकड़े की पुष्टि नहीं करते है।

आदित्य मिश्रा

(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)

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