झारखंड चुनाव परिणाम

झारखंड में झामुमो, कांग्रेस और राजद के गठबंधन को सरकार बनाने का जनादेश मिला है। हेमंत सोरेन के नेतृत्व में अगली सरकार बनाने की तैय़ारी की जा रही है।
झामुमो ने 30 सीटें हासिल कर बड़ी कामयाबी हासिल की है। कांग्रेस को 15 और राजद की एक सीटों को मिलाकर विपक्षी गठबंधन के पास कुल 46 सीटें हैं। इसके साथ ही झामुमो ने प्रदेश में सरकार बनाने के जादुई आंकड़े 41 को पार कर लिया है। सत्तारूढ़ भाजपा 37 से 26 सीटों पर सिमट गई है।
इंडियन चाणक्य अनुसंधान में भाजपा की हार के जो कारण सामने आ रहे हैं वह निम्न हैं-
●स्थानीय मुदे
-खनिज संपदा, शासन की कुरीतियां, जैव-विविधता ऊर्जा, तथा बाजार आदि मुद्दों पर सरकार की विफलता
 
-निवेशक, युवा, किसान, आदिवासी,आमजन, अधिकारी तथा महिलायों के विश्वास का टूटना और वोटिंग शिफ्ट हो जाना।
 
●आतंरिक कलह/ सरयू फैक्टर
-भाजपा का चेहरा रहे निवर्तमान मुख्यमंत्री रघुबर दास पार्टी के बागी सरयू रॉय से हार गये। राय ने जमशेदपुर पश्चिम से टिकट नहीं मिलने पर भाजपा छोड़ दी थी और जमशेदपुर पूर्वी सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा जहां से दास पांच बार विधायक रहे हैं।
-सरयू फैक्टर से भाजपा की पांच सीटें प्रभावित हुईं। ऊपर से केंद्रीय नेतृत्व धारा 370, राम मंदिर और नागरिकता कानून को चुनावी मुद्दा बनाने में लगी रही।
●स्थानीय चुनाव का तेजी से राज्य सरकार और स्थानीय कारकों/निर्णयों से प्रभावित होना।
-बता दें कि लोकसभा में नागरिकता कानून 9 दिसंबर को पास हो गया था और 12 दिसंबर को इस पर राज्यसभा की भी मुहर लग गई थी। नौ दिसंबर के बाद झारखंड में तीन चरण के चुनाव हुए, जिनमें 48 सीटों पर वोटिंग हुई। इनमें भी बाद के दो चरण की 31 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी राज्य के औसत से ज्यादा है।
-इनके अलावा, भाजपा की हार की सबसे बड़ी वजह जो सामने आ रही है वह है विधानसभा चुनाव में ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन पार्टी (आजसू) का गठबंधन से बाहर निकलना। आजसू के बाहर निकलने का खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा। वहीं, विपक्षी दल झामुमो, कांग्रेस और राजद का गठबंधन एकजुट रहा।
●वास्तविक हक़ीक़त के उलट केवल विज्ञापनिक विकास.
-आर्थिक विषयों के जानकार बताते हैं कि दास का विकास सिर्फ जुमले में सुनाई देता था और विज्ञापनों में दिखता था, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि उनकी सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों पर ध्यान ही नहीं दिया।
वहीं, कुछ लोगों का कहना है कि झारखंड में भाजपा की हार अहंकार की प्रवृत्ति का नतीजा है।
-रघुवर दास की सरकार ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और पैरा-शिक्षकों पर लाठी लार्च करवाया, जिससे गांव-गांव और घर-घर में सरकार के प्रति असंतोष का माहौल था।
रघुबर दास की अहंकार की प्रवृत्ति से आम लोग से लेकर अधिकारी तक नाखुश थे। उन्होंने बताया कि इस सरकार ने इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर ठेकेदारी को बढ़ावा दिया जबकि रोजगार पैदा करने के लिए कोई काम नहीं किया।
●बेरोजगारी
-इस चुनाव में गांव से लेकर शहर तक बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा था। रांची स्थित रिम्स (राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) तक में डॉक्टरों की बहाली नहीं हुई। शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर सरकार ने सिर्फ विज्ञापन प्रकाशित किया, हकीकत में इन दोनों क्षेत्रों में कोई काम नहीं हुआ।
● राजनीतिक पार्टियों का हाईकमान कल्चर.
-रांची विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जयप्रकाश खरे के अनुसार, “कांग्रेस हो या भाजपा, सभी पार्टियों ने हाईकमान कल्चर अपना लिया है। कांग्रेस की तरह भाजपा भी इस कल्चर को अपना चुकी है, इसलिए भाजपा के लिए यह एक संदेश है कि वह हाईकमान कल्चर से बचे।”
● सामाजिक भावनाएं और स्वीकार्यता का तानाबाना.
-इस सरकार के दौरान मॉब लिंचिंग की घटना से भी लोग नाराज थे। उन्होंने कहा कि यह सरकार झारखंड के सामाजिक ताना-बाना को नहीं समझ पाई जिससे आदिवासी के साथ-साथ दूसरे समुदाय में भी असंतोष था। अगर अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया जाता तो भाजपा बेहतर स्थिति में रहती।
-सरकार जिस विकास की बात करती थी वह शहरों तक ही सीमित थी, गांव विकास से महरूम था। उन्होंने कहा कि प्रदेश में भाजपा की सरकार से लोगों को जो उम्मीद थी उसे पूरा करने में यह सरकार विफल साबित हुई।
● मुख्यमंत्री का जन-भावना के अनुरूप ‘संसाधनिक और प्रशासनिक’ मशीनरी का उपयोग न करके, दिखावे में फंस जाना।
-साल 2000 में झारखंड राज्य बिहार से अलग होकर बना था. तब से अब तक 19 साल में राज्य छह मुख्यमंत्री देख चुका है. झारखंड जब बना था तब भाजपा ने राज्य की पहली सरकार बनाई थी. बाबूलाल मरांडी भाजपा की तरफ से राज्य के सीएम बने थे. हालांकि अगले चुनाव में ही उन्हें अपनी सीट से हार का सामना करना पड़ा था.
-बाबूलाल मरांडी के बाद अर्जुन मुंडा झारखंड के मुख्यमंत्री बने. फिर शिबू सोरेन, मधु कोड़ा, और हेमंत सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री बने. लेकिन हर बार के चुनाव में मुख्यमंत्री अपनी सीट बचाने में सफल नहीं रहे. इसप्रकार यह ऐतिहासिक मिथक भी एक उदाहरण गढ़ रहा है।

 

 

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