“कजरारी आँखे”

“कजरारी आँखे”

पलकों में आकाश लिए मैं, सागर तट को कबतक देखुं फिर वहीं कजरारी आँखें…बोलो कबतक उन्हें निरखूँ । हर शाम तु ही अंतिम सरगम,हर सुबह की तु पहली लोरी, दिनरात तेरी इन यादों में, बहते कुछ आँसू चोरी-चोरी कभी शाम जो निपट अकेले,इन अधरो को छुना चाहुं, वहीं सांझ की चंचल...